Friday, July 11, 2014

चूडियां।

कलम से _____

1st July, 2014

मेरी धर्म पत्नी द्वारा टूटी चूडियों से बनाई गई कलाकृति पर नजर क्या गई, एक कविता चूडियों पर मेरे जेहन में बन गई। जीवन का हर पहलू अपने आप में एक कहानी है।वही कहानी कभी कभी सुदंर कविता बन जाती है जिसे आपके समक्ष मैं समय समय पर प्रस्तुत करता हूं। यह कविता भी ऐसी एक कहानी पर आधारित है ।

चूडियां।

नारी का श्रंगार हैं ये चूडियां,
वक्त आने पर बदलती है रूप चूडियां,
हरी, गुलाबी, नीली, पीली, सतरंगी चूडियां,
हैं ये सुहागन की मनभावन चूडियां।

हरे कांच की चूडी,
प्यार की निशानी,
कहती है तेरे मेरे,
प्यार की कहानी।

लाल कांच की चूडी,
सुहाग की निशानी,
विवाह के बंधन में बंधे हैं हम,
है इसे बतानी।

हाथों में जब खनकती हैं ये चूडियां,
पिया मनभावन होती हैं चूडियां,
कभी नींद पिया की उडाती हैं चूडियां,
सातसुरी संगीत सुना कर सुलाती हैं चूडियां।

एक बार पत्थर से जो तोड दीं जाती हैं चूडियां,
फिर टूटी हुई चूडियों से नही सजती हैं कलाइयाँ,
टूटे ख्वाबों के सहारे जीनी पडती है जिदंगी,
बहुत नाजुक होती हैं ये कांच की चूडियां।





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