कलम से _ _ _ _
2nd July, 2014
जान पहचान के एक सज्जन बहुत दिन बाद मिले,
मैने उनसे पूछा कहां चले गए थे,
कहने लगे इतिहास ढूढं रहा था,
कौतूहल वश मैने पूछा वह कैसे,
कहा उन्होंने पाकिस्तान गया था।
कुछ लोगों का सबकुछ छूट गया था,
रिश्ता टूट गया था,
अपनों में, पराया सा हो गया था,
रोते रोते, आखों के आगे मैं खो गया था।
जो खो गया था,
ढूँढने उसी को मै गया था,
इतिहास हमारा वहीं रह गया था,
अजनबी हो गए थे,
अपनों के ही बीच खो गए थे।
पावं जमाने में दुबारा वक्त बहुत लगता है,
जिदंगी के हर छूटे पल को पकडना पडता है,
अपनों में से अपनों को ही ढूंढना पडता है,
इतिहास नए सिरे से लिखना पडता है।
2nd July, 2014
जान पहचान के एक सज्जन बहुत दिन बाद मिले,
मैने उनसे पूछा कहां चले गए थे,
कहने लगे इतिहास ढूढं रहा था,
कौतूहल वश मैने पूछा वह कैसे,
कहा उन्होंने पाकिस्तान गया था।
कुछ लोगों का सबकुछ छूट गया था,
रिश्ता टूट गया था,
अपनों में, पराया सा हो गया था,
रोते रोते, आखों के आगे मैं खो गया था।
जो खो गया था,
ढूँढने उसी को मै गया था,
इतिहास हमारा वहीं रह गया था,
अजनबी हो गए थे,
अपनों के ही बीच खो गए थे।
पावं जमाने में दुबारा वक्त बहुत लगता है,
जिदंगी के हर छूटे पल को पकडना पडता है,
अपनों में से अपनों को ही ढूंढना पडता है,
इतिहास नए सिरे से लिखना पडता है।

















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