कलम से-----
4th June, 2014
मैं जब जब बिखरा हूं,
एक तुम ही तो थीं,
अपनी साडी के पल्ल् से समेटा था,
नयनों की भाषा को तुमने ही जाना था।
आज तुम दूर हो,
फिर भी मेरे दिल के करीब हो,
लौट शीघ्र आओ अब,
अपने मैके से,
अहसास है मुझे मिलता होगा,
अम्मा दद्दा का लाड दुलार वहां,
बचपन के कुछ साथी भी होंगे वहां,
झूले पडते होगें,
पीगें तुम भरती होगी,
खीर पूडी खाने को मिलती होगी,
लल्लन कक्का सेवा करते खूब होगें,
दिन भर बच्चों जैसी भगदड रहती होगी,
सबकुछ मनमाफिक होता होगा,
कहीं रात अकेले मेरी कमी खलती होगी,
हां ऐसे ही होता होगा जैसा मैने सोचा है,
बाँधो सामान अपना तुमको वापस घर आना है।
मै फिर बिखर न जाऊँ,
साधन इसका करना है,
राह देख रहा हूँ मै अब,
तुम्हारे आ जाने की,
कहती खडी हो जैसे,
धूप चढ आई ऊपर,
अब तो आखें खोलो,
अब तो आखें खोलो।k — with आशीष कैलाश तिवारी and 36 others.
4th June, 2014
मैं जब जब बिखरा हूं,
एक तुम ही तो थीं,
अपनी साडी के पल्ल् से समेटा था,
नयनों की भाषा को तुमने ही जाना था।
आज तुम दूर हो,
फिर भी मेरे दिल के करीब हो,
लौट शीघ्र आओ अब,
अपने मैके से,
अहसास है मुझे मिलता होगा,
अम्मा दद्दा का लाड दुलार वहां,
बचपन के कुछ साथी भी होंगे वहां,
झूले पडते होगें,
पीगें तुम भरती होगी,
खीर पूडी खाने को मिलती होगी,
लल्लन कक्का सेवा करते खूब होगें,
दिन भर बच्चों जैसी भगदड रहती होगी,
सबकुछ मनमाफिक होता होगा,
कहीं रात अकेले मेरी कमी खलती होगी,
हां ऐसे ही होता होगा जैसा मैने सोचा है,
बाँधो सामान अपना तुमको वापस घर आना है।
मै फिर बिखर न जाऊँ,
साधन इसका करना है,
राह देख रहा हूँ मै अब,
तुम्हारे आ जाने की,
कहती खडी हो जैसे,
धूप चढ आई ऊपर,
अब तो आखें खोलो,
अब तो आखें खोलो।k — with आशीष कैलाश तिवारी and 36 others.

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