कलम से _ _ _ _
30th June, 2014
सागौन के
ऊँचे ऊँचे
दरख्त,
शहर से दूर बहुत।
शोरगुल
हवाऔं का,
टकराते पत्तों का,
यदाकदा
चीतल
पुकारता
जंगल का राजा
है, आस पास कहीं,
यह दर्शाता।
देखने को जिसको
खुले वन में,
मनुष्य दूर से है आता,
नजर वह फिर भी
किस्मत वालों से ही मिलाता।
पहली बारिश में,
जगंल से उठती
सोंधी सी सुगंध से,
मन मेरा डोल डोल जाता।
इस अहसास के जीने को,
मन मेरा बार बार करता।
(यह कविता लिखते समय मेरे दिल दिमाग पर टिकरी का जगंल छाया हुआ था) — withRam Saran Singh and 44 others.
30th June, 2014
सागौन के
ऊँचे ऊँचे
दरख्त,
शहर से दूर बहुत।
शोरगुल
हवाऔं का,
टकराते पत्तों का,
यदाकदा
चीतल
पुकारता
जंगल का राजा
है, आस पास कहीं,
यह दर्शाता।
देखने को जिसको
खुले वन में,
मनुष्य दूर से है आता,
नजर वह फिर भी
किस्मत वालों से ही मिलाता।
पहली बारिश में,
जगंल से उठती
सोंधी सी सुगंध से,
मन मेरा डोल डोल जाता।
इस अहसास के जीने को,
मन मेरा बार बार करता।
(यह कविता लिखते समय मेरे दिल दिमाग पर टिकरी का जगंल छाया हुआ था) — withRam Saran Singh and 44 others.


No comments:
Post a Comment