Friday, July 11, 2014

नरही काफी हाउस

आज श्री एस पी त्रिपाठी जी से मैसेंजर पर बात हुई। फिर याद हो आया कि एक पोस्ट में उन्होंने नरही काफी हाउस का जिक्र किया था। मैंने यह कविता उस समय पूरी की थी। सोचा था कि पोस्ट करूंगा पर फिर भूल ही गया। ढूँढके निकाली है, उनको समर्पित है।
हजरतगंज नरही लखनऊ का हमारे वक्त का काफी हाउस का क्या कहना? कई हसीन शामों की यादों की बारात सी लग जाती है। बहुत वक्त गुजरा है वहां, अच्छा और बुरा भी। उन यादों के लिए भी।

कलम से------

दो जिंदगी जिए जा रहीं हैं,
अपनी राह चली जा रहीं हैं,
एक रहती महानगर
दूजी रहती नरही पर।

हर रोज मिल जाया करतीं हैं।

एक से मुलाकात काफीहाउस की टेबल पर होती है,
दूसरी से मुलाकात सब्जी मंडी की दुकान पर होती है,
जिंदगी दो रंगों मे चलती रहती है।

काफीहाउस की टेबल पर झिक झिक सियासी होती है,
कुछ नये की तलाश मे लोग आते हैं,
कुछ वक्त गुजार फिर घर का रास्ता अपनाते हैं।
मंटा और यशपाल भी यहाँ मिल जाते हैं।

दूसरी से मुलाकात सब्जी खरीदने में हो जाती है,
यहाँ भी झिक झिक होती है,
सस्ता पा जा जाने की खवाइश जो होती है,
यहाँ आना सब्जी खरीदना भी जरूरी होता है,
जिंदगी किसी की इसी भरोसे चलती है।
यहाँ चांद से मुलाकात जो होती है।

दो दो कहानियाँ बनती और बिगडतीं हैं
मेरी जिंदगी बस यूँ ही कटती रहती है।
 — with Ram Saran Singh and 35 others. (4 photos)
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  • Anil Kumar Madan Aap ne to mujhe sahi me coffee house pahucha diya yad aa gaye wo beete pal begning of seventees
  • S.p. Singh अनिल, वो गुजरा वक्त कभी वापस नहीं आता है। बस यादें रह जातीं हैं। हम यादों के सहारे हंस और रो लेते हैं।
    मुझे याद पडता है कि कितना सस्ते का जमाना था। एक शाम गंज में पचास पैसे में गुजर जाती थी। पच्चीस पैसे की काफी और पच्चीस में पान की गिलौरी। गंजिग करो और मस्त रहो।

    आजकल के लोग कहां अहसास कर पाएंगे उस वक्त के लखनऊ का। वो लखनऊ अपना सा लगता था। अब पहले जैसी बात नहीं है।
    May 31 at 1:30pm · Edited · Like · 3
  • Anil Kumar Madan Sahi farmaya singh saheb
  • BN Pandey LUCKNOW SAHAR KI NAWAABI, TAHZEEB, BOL- CHAL KA DHANG NAI- NAI COLONIA BHALE BADAL GAYi HO LEKIN APANE AWADH KI "JAAN" WAHI PURANE ZAMAANE KI "COFFEE HOUSE" KA APANA EK "KHAAS MIZAAZ" ABHI BHI WAISE HI BARKARAAR HAI. AAJ BHI USI JOSH SE WAH APANE BICHHARE HUYE TAMAAM HAZARAAT MEHMANO KA CHIR PARCHIT ANDAAZ ME IKRAAM KARATA HAI. USE BHI SHAYAD INTZAAR HAI US GHARI KI JUB DO PURANI HASTI JANAAB S. P. (SINGH SB.+TRIPATHI SB.) KI JORI USKE DARWAAZE PER DUSTKAT DEGI AUR DIWARE GAWAAH BANEGI ZAZBAATO KI...............HUM SUBO KO BHI EK NAI RACHANA PARHANE KA SAUBHAGY MILEGA.........SADAR NAMAN
  • S.p. Singh बहुत बहुत धन्यवाद पांडे जी।
  • Kunwar Krishna Srivastava Sweet memories of olden golden days.....
  • Sp Tripathi Bahut sundar, Aajkal coffee house ka rup badal gaya hai. hafte me ek din ya kuchh vishesh awasar par jana hota hai.Samay bitane e liye achhi jagah hai. Ab to baithki karne ke liye alag table hai . 25% ka discont hai is table per baithkbajo ke liye.
  • Bhawesh Asthana haan bhai sahib ! ek din main gayaa thaa. ICH kaa nazaaraa bilkul hi badal gayaa hai
  • Sudhir Mohan बहुत ही सुंदर ।See Translation
  • Suresh Chadha Yadey hi yadey 
    Sir ji
  • S.p. Singh धन्यवाद।
  • Baba Deen · Friends with Bagga Sk and 19 others
    MATHURA KE SHAHAR SE ,KANS KE KAHAR SE JISE DEKH KE MAN TARSE,TARSAANE WALE AA GAYE ,BARSANE WALE AA GAYE. GANGA KE LAHAR SE,JISE DEKH KE MAN HARSHE,HARSHAANE WALE AA GAYE,,BARSAANE WALE AA GAYE.....AAPKI KAVITA MEN KAFI DAM HAI,ACHCHHI LAGI..
  • S.p. Singh आप क्या बरसाने से हैं, बाबा दीन जी। आप की टिप्पणी सटीक है।धन्यवाद।
  • Javed Usmani बहुत सुंदरSee Translation
  • S.p. Singh आपका आभारी हूँ।

2 comments: