कलम से _ _ _ _
9th July, 2014
सभझ के बाहर
यह होता जा रहा है
सब जो मन को बहुत भाता है
वह सब
जो हो गया है पुराना
क्यों नहीं छोडा जाता नहीं है
बार बार क्यों
दिल दुबारा उनसे जुडता जाता है।
ऐ दिल
ऐसा क्यों होता है
हम बचपन से निकल आते हैं
जवानी की सीढी चढ जाते हैं
पैर फिसलते जाते हैं
दलदल में समाते जाते हैं
बुढापे की ओर बढने लगते हैं
बचपन में लौटना चाहकर भी
बापस बचपन में लौट नहीं पाते हैं।
जिदंगी के कुछ दिन
गुजारते नीम तले
यह ख्वाहिश क्यों जोर पकडती जाती हैं
ख्वाहिशें क्यों इतना सताती हैं।
गांव वापस जाने को
मन बहुत करता है
वहां जाकर भी
वहां के नहीं हो पाते हैं
अपने ही लोग अपनों से नजर चुराते हैं।
मिलकर सब
आपको वापस शहर भगाते हैं
शहर आकर
आप फिर गांव जाते हैं
गावं से शहर
फिर भगाए जाते हैं।
न हम यहाँ के
न हम वहाँ के रहके
शान्ति से जी पाते हैं
फिर भी कभी जीने की
तो कभी मरने की
कोशिश में लगे रहते हैं।
क्यों हम जग के
माया मोह छोड नहीं पाते हैं?
9th July, 2014
सभझ के बाहर
यह होता जा रहा है
सब जो मन को बहुत भाता है
वह सब
जो हो गया है पुराना
क्यों नहीं छोडा जाता नहीं है
बार बार क्यों
दिल दुबारा उनसे जुडता जाता है।
ऐ दिल
ऐसा क्यों होता है
हम बचपन से निकल आते हैं
जवानी की सीढी चढ जाते हैं
पैर फिसलते जाते हैं
दलदल में समाते जाते हैं
बुढापे की ओर बढने लगते हैं
बचपन में लौटना चाहकर भी
बापस बचपन में लौट नहीं पाते हैं।
जिदंगी के कुछ दिन
गुजारते नीम तले
यह ख्वाहिश क्यों जोर पकडती जाती हैं
ख्वाहिशें क्यों इतना सताती हैं।
गांव वापस जाने को
मन बहुत करता है
वहां जाकर भी
वहां के नहीं हो पाते हैं
अपने ही लोग अपनों से नजर चुराते हैं।
मिलकर सब
आपको वापस शहर भगाते हैं
शहर आकर
आप फिर गांव जाते हैं
गावं से शहर
फिर भगाए जाते हैं।
न हम यहाँ के
न हम वहाँ के रहके
शान्ति से जी पाते हैं
फिर भी कभी जीने की
तो कभी मरने की
कोशिश में लगे रहते हैं।
क्यों हम जग के
माया मोह छोड नहीं पाते हैं?
— with आशीष कैलाश तिवारी and 46 others.

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