Friday, July 11, 2014

अपना गावं

कलम से _ _ _ _

9th July, 2014

सभझ के बाहर 
यह होता जा रहा है 
सब जो मन को बहुत भाता है
वह सब
जो हो गया है पुराना
क्यों नहीं छोडा जाता नहीं है
बार बार क्यों
दिल दुबारा उनसे जुडता जाता है।

ऐ दिल
ऐसा क्यों होता है
हम बचपन से निकल आते हैं
जवानी की सीढी चढ जाते हैं
पैर फिसलते जाते हैं
दलदल में समाते जाते हैं
बुढापे की ओर बढने लगते हैं
बचपन में लौटना चाहकर भी
बापस बचपन में लौट नहीं पाते हैं।

जिदंगी के कुछ दिन
गुजारते नीम तले
यह ख्वाहिश क्यों जोर पकडती जाती हैं
ख्वाहिशें क्यों इतना सताती हैं।

गांव वापस जाने को
मन बहुत करता है
वहां जाकर भी
वहां के नहीं हो पाते हैं
अपने ही लोग अपनों से नजर चुराते हैं।

मिलकर सब
आपको वापस शहर भगाते हैं
शहर आकर
आप फिर गांव जाते हैं
गावं से शहर
फिर भगाए जाते हैं।

न हम यहाँ के
न हम वहाँ के रहके
शान्ति से जी पाते हैं
फिर भी कभी जीने की
तो कभी मरने की
कोशिश में लगे रहते हैं।

क्यों हम जग के
माया मोह छोड नहीं पाते हैं?



  • Anjani Srivastava हर रिश्ते में विश्वास रहने दो;
    जुबान पर हर वक़्त मिठास रहने दो;
    यही तो अंदाज़ है जिंदगी जीने का;
    न खुद रहो उदास, न दूसरों को रहने दो............
    See Translation
  • Ram Saran Singh चाह कर भी गाँव नहीं रह पाते । यह हम सबके साथ घटित हो रहा है । आपसे जुड़ा लगभग हर व्यक्ति स्वार्थ की डोर से बँधा है । जब यह डोर ढीली पड़ती है तो रिश्ते दरकने लगते है । आपसे सबको उम्मीदें है । जब तक पूरी होती रहेंगी सब आपके अपने होंगे । यह मेरा जिया हुआ अनुभव है । आज भी इसे जीना पड़ता है ।
  • S.p. Singh कटु सत्य जीवन का आपने बयान किया है और यथार्थ के साथ धरातल पर आने की बहुत आवश्यकता है आज के परिवेश में।
    धन्यवाद महोदय।
  • S.p. Singh आशीष वचन के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, दद्दा जी।
  • आशीष कैलाश तिवारी ',,,, हम जग के माया मोह छोड नहीं पाते हैं?',,,, ज्वलंत है सवाल,,,,, ना जाने किसे उत्तर पता है? *****सु-प्रभातम् सर। See Translation
  • S.p. Singh बिलकुल सही।
    उत्तर होते हुए भी अनुउत्तर है।
    धन्यवाद आशीष।
  • Arun Kumar Singh Good Morning ..Sir, Bahut accha
  • S.p. Singh धन्यवाद अरुण सुप्रभात।
  • M.p. Awasthi · Friends with Janardan Pandey
    wah wah ek yatharth parak rachna ke liye dhanyawad. ati uttam, aj samaj mein sabke saath yahi ho raha hai, ek purani kahawat dhobi ka kutta na ghar ka na ghat ka aj humari halat bhi aisi hi hai, gaon mein bhi kisi ke pass apke liye samay nahi hai, unki apni dincharya hai ussi mein vyast rahna chahte hain.
  • S.p. Singh धन्यवाद अवस्थी जी।
  • Harihar Singh क्यो हम जग के माया मोह नही छोड पाते है बहतरीन प्रस्तुति ।मन का अन्तस झकझोरने वाली।See Translation
  • S.p. Singh बहुत बहुत धन्यवाद हरिहर भाई। आपकी रचनाएँ मनमोहक होती हैं। बहुत पसन्द है। ऐसे ही लिखते रहिये।
  • Rajan Varma 'क्यों हम जग के माया मोह छोड़ नहीं पाते हैं' - अति उत्तम प्रश्न के साथ आपने अपनी काव्य-रचना को समाप्त करते हुये पाठकों को home work दे दिया; मन हमारा लज्ज़त का आशिक है अर्थात इसे जो भी वस्तु/पदार्थ/व्यक्ति प्रिय अ़थवा मीठा लगता है तो ये तुरंत फ़ीकी वस्तु/पदार्थ/व्यक्ति का त्याग कर देता है; मिसाल के तौर पर अगर एक भिखारी से उसकी मुट्ठी में बंद दिन भर की कमाई के चंद सिक्के छीनना चाहें तो वह मरने-मारने पर उतारू हो जायेगा; अगर आप उसके दूसरे हाथ में १००-१०० के पाँच नोट रख दें तो सिक्कों वाली मुट्ठी स्वत: ढीली हो जाती है । 
    एक अौर उद्धारण देखिये- बिटिया युवावस्था में प्रवेश करते ही माँ-बाप उसे कहना शुरू करदें कि बेटा तेरा ब्याह हो जायेगा, तुम अपने पति के घर चली जाअोगी- अत: तुम्हें माँ-बाप, भाई-बहनों, सखी-सहेलियों का मोह त्याग कर देना चाहिये; कन्या कितनी भी कोशिश क्यों न करले कभी कामयाब नहीं हो सकती; उसी लड़की का जब ब्याह हो जाता है अौर धीरे-धीरे जब उसका पति से प्रेम बढ़ता है तो स्वत: माँ-बाप, भाई-बहनों का प्रेम फ़ीका पड़ जाता है ।
    ये मन की nature है; पर जब् रदस्ती मन detach नहीं करना है; attachment cause detachment; detachment does not causes attachment; जैसा कि हमने उक्त दो उद्धारणों में देखा ; 
    अौर रही बात रिश्तों की तो ये सब तो स्वार्थ के ही रिश्ते हैं- स्वार्थ सिद्ध होता न दिखे तो बेटा बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ आने में कतई देर नहीं करेगा- वो भी अगर बालक सपूत हुआ तो- अन्यथा तो बिना टिकट के, गुमनाम दिशा में जाती हुई ट्रेन में बैठा देगा ये कह कर कि पिताश्री गंगा स्नान कर आइये- स्वर्ग की बहुत इच्छा है न आपको !
  • Chadha Vijay Kumar Separations Are Those Wounds That Nobody Can Heal…
    And Memories Are Those Treasures That Nobody Can Steal.
  • S.p. Singh Very well said by both of you. Very valid and pertinent points. I fully respect.
  • Puneet Chowdhary Sir its a story of divided heart and divided mind.Heart and mind speak contrary.Heart says what the person wants to do and mind is the final decision maker and considers all practicalities.Thats the reason GOD has placed mind over and above human heart in the body so that mind prevails eventually.Just to end very sentimental lines drawing u to your past which u still want to live more and which u still cherish more as compared to present
  • S.p. Singh पुनीत, 

    बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति।
    इतनी अच्छी व्याख्या की है जिसका कोई तोड है ही नहीं। अति उत्तम।
    बहुत बहुत धन्यवाद।
  • Puneet Chowdhary thanks sir
  • Javed Usmani बहुत खूबसूरतSee Translation
  • S.p. Singh धन्यवाद जावेद भाई।
  • Rajani Bhardwaj ek pyara sa ganw .jisme peepal ki chhanw.........bahut yaad aata hSee Translation
  • Vijay Baghla · Friends with Rajani Bhardwaj
    Haan sach me...bahut yaad aata hai....!!!
  • S.p. Singh सभी बन्धु बान्धवों को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर शत शत नमन।

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