कलम से _ _ _ _ _
24th June2014
आशीष तिवारी जी से प्रेरित होकर:-
बचपन से ही मैने हिन्दुस्तान अखबार पढा है। शुरुआत में हिंदी में और बडे होने पर इंग्लिश में।
आजकल भी हमारे यहां अग्रेजी का अखबार ही आता है। इसका वजन दिन के हिसाब से घटता या बढता रहता है।
इतवार के दिन तो इसका वजन भी ठीक ठाक रहता है साथ में एक पुछल्ला भी लगा रहता है। उसे ब्रंच कहते हैं।
आजकल के हिसाब से मैटीरियल इसमें ठीक ठाक होता है।
पिछले सनडे के साथ जो ब्रंच आया था उसके एक आरटीकल में ' The Finest Indian. Novels ' का जिक्र था।
मेरे स्वभाव के अनुसार मैने यह आरटीकल पढा। ताज्जुब इस बात का था कि इंग्लिश भाषा में लिखने वाले लोगों के कार्य का तो जिक्र मिला परंतु हिंदी भाषा में लिखने वालों का कहीं नाम नहीं था।
अंग्रेजी भाषा थोडी बहुत पढ लेता हूँ और लिख इतनी लेता हूँ कि अपना काम चले। भारत सरकार की नौकरी करी है वहीं से सेवानिवृत मिली है तो यह माना जा सकता है कि इंग्लिश का ज्ञान काम चलाने भर के लिए ठीक होगा।
मै बचपन से ही हिंदी में सोचता हूँ और फिर आवश्यकतानुसार अंग्रेजी में ट्रांसलेशन करता हूं। मेरे विचार में अधिकांश हिंदीदां लोग यही करते हैं।
ताज्जुब इसका होता है कि यही लोगां सबसे ज्यादा अंग्रेजी के हक में बोलते हैं।
हम लोगों को हिंदी भी काम चलाने वाली आती है उसी से काम चला लेते हैं।
हिंदी वाले लोग कम से काम हिंदी में करें तो खुशी होगी।
कविता तो हिंदी में ही लिखी पढी जाती है।
धन्यवाद। — with Ram Saran Singh and 8 others.
24th June2014
आशीष तिवारी जी से प्रेरित होकर:-
बचपन से ही मैने हिन्दुस्तान अखबार पढा है। शुरुआत में हिंदी में और बडे होने पर इंग्लिश में।
आजकल भी हमारे यहां अग्रेजी का अखबार ही आता है। इसका वजन दिन के हिसाब से घटता या बढता रहता है।
इतवार के दिन तो इसका वजन भी ठीक ठाक रहता है साथ में एक पुछल्ला भी लगा रहता है। उसे ब्रंच कहते हैं।
आजकल के हिसाब से मैटीरियल इसमें ठीक ठाक होता है।
पिछले सनडे के साथ जो ब्रंच आया था उसके एक आरटीकल में ' The Finest Indian. Novels ' का जिक्र था।
मेरे स्वभाव के अनुसार मैने यह आरटीकल पढा। ताज्जुब इस बात का था कि इंग्लिश भाषा में लिखने वाले लोगों के कार्य का तो जिक्र मिला परंतु हिंदी भाषा में लिखने वालों का कहीं नाम नहीं था।
अंग्रेजी भाषा थोडी बहुत पढ लेता हूँ और लिख इतनी लेता हूँ कि अपना काम चले। भारत सरकार की नौकरी करी है वहीं से सेवानिवृत मिली है तो यह माना जा सकता है कि इंग्लिश का ज्ञान काम चलाने भर के लिए ठीक होगा।
मै बचपन से ही हिंदी में सोचता हूँ और फिर आवश्यकतानुसार अंग्रेजी में ट्रांसलेशन करता हूं। मेरे विचार में अधिकांश हिंदीदां लोग यही करते हैं।
ताज्जुब इसका होता है कि यही लोगां सबसे ज्यादा अंग्रेजी के हक में बोलते हैं।
हम लोगों को हिंदी भी काम चलाने वाली आती है उसी से काम चला लेते हैं।
हिंदी वाले लोग कम से काम हिंदी में करें तो खुशी होगी।
कविता तो हिंदी में ही लिखी पढी जाती है।
धन्यवाद। — with Ram Saran Singh and 8 others.

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