Saturday, July 12, 2014

समय थोडा है, काम जरूरी है,

कलम से____

27th June, 2014

दो रोज पहले हमारे मित्र श्री राजन वर्मा जी ने इल्तिजा की थी कि उनके लिए मैं कुछ कहूँ।
उनका आदेश मान कर एक छोटी सी कोशिश की है। आशा है पसंद आएगी।
शब्द, मुहावरे इत्यादि वही इस्तेमाल किए गए हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी के अभिन्न अंग हैं। मेरी यह तुच्छ भेंट उनके नाम है।
________________________________

समय थोडा है, काम जरूरी है,
मौका यही है, मगर फिर भी फुरसत नहीं है,
कहना यह ठीक नहीं है,
काम तुम्हारे हैं, तुम्हें ही निपटाने हैं,
चैन पाओगे, जब काम सब निपट जाएगें ।

मौके की तलाश में रहो,
मौके हजार आएगें,
क्या तुम्हें करना है, यह याद दिलाएंगे,
भूल करोगे, तो पछताओगे,
राम जी के शरणागत हो जाओ,
काम बिगडे सब बन जाएगें।

फुरसत में चैन की बंसी बजे,
हर दिन मौसम एकसा रहे,
ऐसा कहां होता है,
आखिर होता है,
वही जो मंजूरे खुदा होता है।

सल्तनत खुदा की कुबूल करो,
अल्लाह के बनाए उसूलों पर चलो,
भगवान भी तुम्हारा हो जाएगा,
जो अब तक तुम्हारा न हुआ है,
वो भी तुम्हारा हो जाएगा।
 — with आशीष कैलाश तिवारी and 50 others.
Photo: कलम से____

27th June, 2014

दो रोज पहले हमारे मित्र श्री राजन वर्मा जी ने इल्तिजा की थी कि उनके लिए मैं कुछ कहूँ।
उनका आदेश मान कर एक छोटी सी कोशिश की है। आशा है पसंद आएगी।
शब्द, मुहावरे इत्यादि वही इस्तेमाल किए गए हैं जो रोजमर्रा की जिंदगी के अभिन्न अंग हैं। मेरी यह तुच्छ भेंट  उनके नाम है।
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समय थोडा है, काम जरूरी है,
मौका यही है, मगर फिर भी फुरसत नहीं है,
कहना यह ठीक नहीं है,
काम तुम्हारे हैं, तुम्हें ही निपटाने हैं,
चैन पाओगे, जब काम सब निपट जाएगें । 

मौके की तलाश में रहो, 
मौके हजार आएगें,
क्या तुम्हें करना है, यह याद दिलाएंगे,
भूल करोगे, तो पछताओगे,
राम जी के शरणागत हो जाओ,
काम बिगडे सब बन जाएगें।

फुरसत में चैन की बंसी बजे,
हर दिन मौसम एकसा रहे,
ऐसा कहां होता है, 
आखिर होता है,
वही जो मंजूरे खुदा होता है।

सल्तनत खुदा की कुबूल करो,
अल्लाह के बनाए उसूलों पर चलो,
भगवान भी तुम्हारा हो जाएगा,
जो अब तक तुम्हारा न हुआ है,
वो भी तुम्हारा हो जाएगा।
  • Ajay Jain Good morning Ji
  • S.p. Singh सुप्रभात जैन साहब।
  • Deobansh Dubey सुंदर ।अति सुंदर भाई जान ।
  • S.p. Singh दुबे जी धन्यवाद।
  • Manoj Kumar · Friends with Javed Usmani and 6 others
    Very nice
  • Anil Kumar Madan Bahut hi sunder prastuti
  • Sp Tripathi आख़िरी पाँच लाइनों जीवन का पूरा सार समाहित कर दिया आपने ।। बहुत अच्छा लगा ।। सुप्रभातम् ।See Translation
  • BN Pandey SIR VARMA JI TO SAAT SAMUNDER PAAR CHAIN KI BANSI BAJAA RAHE HAI. LEKIN HUME YE PAKKA YAKIN HAI AAPANE JO RACHANA UNKO BHEJI HAI USE PARH KER UNKE MUN ME BHAV KUCHH ES TARAH UTHE HONGE............. " LOG YU TO ROSE HI AATE RAHE JAATE RAHE, AAJ LEKIN AAP AAYE PAAS TO ACHCHHA LAGAA"
  • S.p. Singh कल एक कविता और भी लिखी थी जैसी वर्मा जी ने कहा था। पर उससे मन को शांति नहीं मिली तो यह दूसरी लिखी। तुम्हें पसंद आई अच्छा लगा। देखना यह है कि जिसके आदेश पर लिखी उनको कैसी लगती है
  • Rajan Varma धन्यवाद सिहँ साहब- आपने मेरे अनुरोध पर मानव-जीवन के मूल उद्देश्य को पाने-समझने का संदेश अपने शुभ-चिंतको तक पहुँचाया; अौर अत्यंत सरल-सटीक तरीके द्वारा- आपने एक शेर का इस्तेमाल किया- होता वही है जो मंजूरे खुदा होता है- बेशक य़ह शत्-प्रति-शत् सही है अौर मैं इसको मानता भी हूँ अौर तर्क-संगत तरीके से सिद्ध भी कर सकता हूँ- अपने उन मित्रों के लिये जो उक्त शेर की आढ़ में अपने बचाव हेतु इस शेर का प्रयोग करते हैं:
    जब बिन रज़ा तेरी पत्ता हिल नहीं सकता, तो बन्दा गुन्हग़ार क्यों ? 
    किस्मत् में लिखा था "पी", तो पी मैंने,
    मैं न पीता, तो तेरा लिखा ग़लत हो जाता;
    तेरे लिखे को निभाया, ये ख़ता की मैंने ।
    मेरे जैसे मन-मुख लोग अपनी कमज़ोरियों का जिम्मा अौर दोष भी ईश्वर के मत्थे ही मढ़ना चाहते हैं- पर मैंने इस पर तर्क-संगत, कड़ी-दर-कड़ी पकड़ कर इस नतीजे पर पहुँचा हूँ, कि-
    बिन रज़ा तेरी पत्ता हिल नहीं सकता, फ़िर भी बन्दा ही गुन्हग़ार है- अौर वह ऐसे:
    यह संसार कर्म-क्षेत्र है, अर्थात "जैसा बीज बोऐंगे, वैसी ही फ़सल काटने आना पड़ेगा" । यह कदापि हो नहीं सकता कि बीज मिर्ची के बोयें अौर आम खाने के हक़दार हो जायें- यह प्रकृति के नियम "कर्म-सिद्धान्त" के विरुद्ध है । हम अनन्त काल से इस स्रषटी में विचर रहे हैं- जो-जो कर्म करते रहे- अच्छे या बुरे- उनका नतीजा भुगतने आना पड़ा- बार बार जन्म लेना पड़ा अौर भुगतान सिंचित कर्मों का फ़िर भी पूरा नहीं हो पा रहा ।
    क्यों इतना पहाड़ बन गया सिंचित कर्मों का ? साधारण सा उद्धारण लेते हैं- मान लीजिये मैंने अपने जीवन काल में १०० मुर्गे खाये- अब मुझे सौ जन्म तो लेने ही पड़ेंगे न, उन सौ मुर्गों की आत्मा से मरने के लिये ! 
    प्रसंग बड़ा होता जा रहा है- कलम को यहीं विराम देता हूँ- किसी को इस तर्क पर आपत्ति हो तो मैं सहर्ष उस का अपनी समझानुसार हल करने का प्रयास करूँगा ।
  • Rajan Varma सर आदेश शब्द का इस्तेमाल न करें- मेरी अौकात मुझे मालुम है; हाँ फ़रमाइश अवश्य की थी
  • S.p. Singh देख पा रहा हूँ मैं 
    कलम क्या कर सकती है
    जो तलवार नहीं करती
    वह कलम किया करती है।

    बहुत सुन्दर विचार उतनी ही सशक्त लेखनी भी। 

    मैं मुरीद हुआ जाता हूँ 
    अपने ही हाथों 
    मैं उनका हुआ जाता हूँ।
    दिल से आभारी हूँ।
    June 27 at 9:53am · Edited · Like · 2
  • Rajan Varma Its my privilege sir. आपको अच्छा लगा यही मेरे लिये बहुत है
  • Ram Saran Singh मतलब यह कि अल्लाह के आगे पूर्ण समर्पण । विश्वास उत्साह का आगार होता है । यही जीवन को आगे बढ़ाने का संबल है ।
  • Ajay Jain aapki likhne ki kala koi talwar se kam tej nahi he ji--sundar somy tareeke se sab kuchh kah jate he ji aap
  • Rajan Varma बिलकुल सही फ़रमाया आपने- पूर्ण समर्पण- अर्थात "बिना-शर्त समर्पण"- ये न हो कि हम १० रू चढ़ा कर दस सूत्रिये माँग पत्र ईश्वर के सन्मुख रख दें- ऐसी पूजा निर्रथक है
  • Vinay Luthra · Friends with Adarsh Kumar
    Wah wah kya baat hai
  • S.p. Singh धन्यवाद लूथरा जी।
  • S.p. Singh आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ मन गद गद हो गया है।
  • आशीष कैलाश तिवारी "क्या तुम्हें करना है, यह याद दिलाएंगे....." 
    समय समय पर याद दिलाते हैं आप सर।
    See Translation
  • S.p. Singh Ultimately सबको यही करना है।
    बीच में छुट्टी लेकर वांए दाएं कुछ करलो उतना ही चलना है बाकी तो जग ठगना है।
  • Javed Usmani बहुत उम्दाSee Translation
  • S.p. Singh जावेद और अजय जी आपका शुक्रिया।
  • UN Tripathi · Friends with Ram Saran Singh
    कविता की अंतिम पंक्तियां तो एकदम मार्मिक एवं दिल में गहरी पैठ बनाकर सोचने समझने एवं कुछ करने को विवश कर देती हैं ।
  • S.p. Singh त्रिपाठी जी आपकी टिप्पणी अच्छी लगी।
    धन्यवाद।
  • Himanshu Mahla bahut khoob,,,,
  • SN Gupta Wah Wah
  • S.p. Singh बहुत बहुत धन्यवाद आपका।
  • S.p. Singh जे हो बग्गा जी।

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