Friday, July 11, 2014

वेदना

कलम से _ _ _ _

5th July, 2014

वेदना,
सन्धि विच्छेद कर देखो बनता है क्या,
वेद+ना,
जिसके घर में आवास निवास नहीं है,
वेदों का,
बनी रहती है हमेशा कलह की वेदना,
दूर करना है तो अतंस की करो विवेचना,
सम्पूर्ण कष्ट कटेगें रहेगा कोई प्रश्न शेष ना,
सुखी मन होगा जब होगा मिलना जुलना।

घर घर प्राण प्राण बसती है पल पल की वेदना,
कुछ ऐसा कर प्राणी तू अब मिट जाए यह वेदना,
रख अपने घर चारों वेद कर उनका पठन पाठन,
देख चमत्कार प्रभु का मिट जाऐगी तेरी वेदना।


— with आशीष कैलाश तिवारी and47 others.
  • You, Narendera Pal SinghRahul SinghJ.m. Garg and 32 others like this.
  • Kamalkant Sahoo Vvv g m...g
  • Das Krishna very true
  • Rajan Varma प्राण हैं तो प्राणी कहलाये अन्यथा मिट्टी; 'खुदा की बन्दगी' करे तो 'बन्दा' कहलाये, अन्यथा जानवर अौर मानव में फ़र्क ही क्या; 'वेदना' का अर्थ आप ने समझा ही दिया- यह हमारी भाषा की खासियत है कि शब्दार्थ को थोड़ी सी गहनता से अध्य्यन करें तो भावार्थ स्वत: विदित हो जाता है; अति सुन्दर अभिव्यक्ति भावार्थ की- बधाई स्वीकारें सिहँ साहब
  • Das Krishna पानी जैसा ही प्राणी है क्योंकि प्राण जो विचारों का नाम है वही जीवन का आधार है।See Translation
  • Javed Usmani बहुत सुंदरSee Translation
  • Ajay Jain ati sundar prasang----- good morning mitrgan
  • Das Krishna मन तरल जल (विचार ) या पानी या प्राणी है और गहराई (प्रेम) मिलते ही वह उसमें समा जाता है। प्रेम मन को अपने आप में समा लेता है।See Translation
  • Rajan Varma 'प्रेम' का शब्दार्थ है 'परे+मैं' अर्थात 'मैं' को 'परे' कर दो तो प्रेम स्वत: हो जाता है;
  • Das Krishna वेद का अर्थ पठन पाठन से नहीं है। वेद प्राकृतिक ज्ञान है। एक बच्चा जिसकी माँ हिंदुस्तानी है वह हिन्दी बिना पढे जान लेता है। जिसकी माँ स्पेनिश या फ्रेंच है, वह बच्चा अपने आप बिना पढे स्पेनिश या फ्रेंच उस माँ के बराबर का ज्ञान रखेगा। जो जीव प्रकृति को माँ समझता है उसे प्रकृति की भाषा अपने आप बिना पढे ही, अपनी माँ को देखते देखते आ जाती है। यही प्रकृति जो माँ है उनकी वाणी को अपने आप सीखने वाले अबोध बच्चे जिसे ऋषि कहते हैं, उनकी तोतली वाणी ही वेद है। वेद लिखने और पढ़ने का विषय नहीं है क्योंकि क्या माँ (प्रकृति) की मृत्यु हो गयी है, और बच्चे अनाथ हो कर उस माँ की याद में वेद पढ़ रहे हैं ?See Translation
  • Das Krishna प्रेम में न तो भाषा, न व्याकरण, और न ही अर्थ होता है। प्रेम में एकात्म होता है और माँ और बच्चा अपने को एक दूसरे से अलग नहीं समझते।See Translation
  • Das Krishna प्रेम का अर्थ मेरी समझ में परम या अब्सोलूट है । परम आत्मा या परम प्रकृति का मूल ही परम या प्रेम है।See Translation
  • BN Pandey JIS PRAKAAR EK INSAAN KA GHAR DHAN- DAULAT SE BHARAA HO , US DAULAT KO WAH KHARCH KARE N KARE LEKIN USE PURA VISHWAASH HAI KI SANKAT KI GHARI ME YE DHAN MERAA SAATH DEGAA VAISE HE YEDI INSAAN APANE GHARO ME VED -PURAAN KI PUSTAKO KO SIRF RAKH LETAA HAI BHALE HI USE N PARHATAA HO USE APANE DHARM ME PURAA VISHWAASH HAI KI ESI SE MERAA KALYAAN HAI.....................SUNT LOGO NE KAHA HAI..............PURAAN KAA ACHARAN KARE, BHAGWAAN KI POOJA KARE, GAU KI SEVA KARE, TIRTH STHAAN ME SNAAN KARE AUR SACHCHE "SUNT" KAA DARSHAN KARE............& LAST BUT NOT THE LEAST AS PER MY EXPERINCE , ........ VEDANAA PHIR BHI DOOR N HO TO SAMAY NIKAAL KER JANAAB S.P. SINGH SAHIB KI RACHANAAO KA DHYAAN KARE......RADHE RADHE
  • Das Krishna पहिले मनुष्य को ज्ञान अपने आप से मिलना आरंभ होता है। केवल तभी उसे वह ग्रंथ नजर में आते हैं जो उनके ही जैसे किसी यात्री ने जो उसी मार्ग से गुजरा है उसने अपने अनुभव पहिले से ही लिख छोड़े हैं। वे ग्रंथ उसका मार्ग दर्शन नहीं करते क्योंकि उसकी यात्रा तो उसे ही करनी है । किन्तु सद्भाव और प्रेम से लिखा गया यात्रा वृतांत उसे बहुत सुकून देता है। अपने सत्यन्वेषी जीवन यात्रा की अनुभूति ही वेद है और हर एक जीवन का वेद उसका अपना है, और वह सभी के लिए भी एक है।See Translation
  • S.p. Singh मुझे प्रसन्नता है कि इतने सुन्दर विचारों का आदान प्रदान हो रहा है। रह स्वयं में ही अद्भुत चेतना का द्योतक है।
    भगवन और प्रभु की चर्चा हो किसी भी रूप में हो प्रशंसनीय है।
    सभी बंधुओं का सहयोग अपेक्षित है।
  • Harihar Singh बहुत ही शानदार अभिव्यक्ति।See Translation
  • Das Krishna यह सभी जानते हैं कि कवि हृदय, वैज्ञानिकों की तरह सरल नहीं होता। कविता एक कला है और कला उस पैकेजिंग को कहते हैं जो अपने अंदर विज्ञान को छिपा कर रख सके। किसी भी अमूल्य ज्ञान को छिपाने की विधा को ही कला कहते हैं। भगवान शंकर को इसी लिए कलातीत (जिनसे कला कुछ नहीं छिपा सकती) कहते हैं। कठिन विचार को जो सरल कर उसे भौतिक प्रदर्शन तक लाये वही विज्ञान है। ज्ञान और विज्ञान कितना भी सरल या लाभ कारी क्यों न हो, किसी को अच्छा नहीं लगता जब तक उसमें कला की चाशनी न लगाई जाय। कवि वही हो सकता है जो पहिले वैज्ञानिक रहा हो, और उस ज्ञान के प्रस्तुति के लिए कला या कविता का उतना प्रलोभन उचित है जिससे मूल विचार नष्ट न हों। ध्यान रहे, कि भारत में विज्ञान की शिक्षा कला या कविता या छंद या श्लोक के ही माध्यम से दी जाती है। भगवत गीता भी एक गीत है जबकि इसके गर्भ में अद्भुत विज्ञान है।See Translation
  • S.p. Singh महात्मन आपके विचारों से सहमत हूँ।
  • S.p. Singh आपका भेजा हुआ लिंक पढा। बहुत रोचक एवं ज्ञान बर्धक प्रतीत हुआ।
    धन्यवाद।
    July 5 at 10:25am · Edited · Like · 2
  • S.p. Singh आपका भेजा हुआ लिंक पढा। बहुत रोचक एवं ज्ञान बर्धक प्रतीत हुआ।
    धन्यवाद।
  • Neeraj Saxena · Friends with Harihar Singh and 2 others
    Ati sunder
  • Ajay Kumar Misra लेखन और टिप्पणी से ही बहुत जानकारी हो जाती है । वहूत अच्छा है।See Translation
  • Anand Srivastava · Friends with BN Pandey and 16 others
    fine sir

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