Friday, July 11, 2014

सपनों की सौगात।

कलम से-----

1st June, 2014 आज प्रातः ही।

आफिस जाने को हो रहा था तैयार,
बार्डरोब से निकाल कर शर्ट,
चलने को तैयार,
शर्ट का बटन टूटा देख,
माथे गुस्सा आने लगा,
सुनती हो कह कर दी तेज आवाज,
भागी भागी सी आई वो,
पूछा क्या है बात।

इशारे में समझायी मैंने अपनी बात,
झट ले आई बटन सुई धागा सब एक ही साथ,
बोली लाओ टांक दू बटन शर्ट के सीने में,
फिर तो न रहेगी गुस्से की कोई बात।

मैंने भी हामी भर दी सुन उनकी बात,
फिर झट टांक दिया जो टूट गया था,
बटन शर्ट के सीने पर,
शातं हुई उठी थी जहां से यह बात ।

धागा तोडने की कोशिश में
हुई मेरी शर्ट खराब,
लगा रह गया एक सिन्दूरी दाग,
गुस्सा मेरा फिर भडका,
पर हुआ न मैं नाराज,
बाँहों मे ले बोला प्रिये छोडो यह सब,
असाधारण घटना घटे न ऐसे ही,
इसमें भी है कोई बात खास,
आखों में देख अश्रु दो,
हो गया था मैं भी उदास।

लिया गले लगाय तब पूछा,
रोने की क्या है इसमें कोई बात,
होता रहता है ऐसा इसमें नयी नहीं कोई बात,
शर्ट उतार मैं बोला,
चलो आज नहीं जाते हैं,
लेकर छुट्टी आफिस से,
करते हैं प्यार भरी कुछ बात,
बहुत दिन हुए,
नहीं हुई,
वैसे भी हम दोनों में मन की बात,
चलेंगे बाजार कुछ खा पी कर,
आज खरीदेंगे मिल हम सपनों की सौगात,
आज खरीदेंगे मिल हम सपनों की सौगात।।

(हम रोजमर्रा के काम में जीवन की इन घटनाओं को महत्व नहीं देते हैं। महसूस अगर करें तो ऐसी छोटी मोटी घटनायें ही जीवन का असली नमक हैं।स्त्री मन की अपनी समस्याएँ होती हैं, अक्सर पुरुष वर्ग उनको नकारता रहता है। थोडा प्यार और सदभाव अगर बना रहे तो देखिए जीवन जीने का मजा और भी बढ जाता है। पसंद आये तो आशीर्वाद दीजिएगा, नहीं तो क्षमा।)
 — with आशीष कैलाश तिवारी and 45 others.
Photo: कलम से-----

1st June, 2014  आज प्रातः ही।

आफिस जाने को हो रहा था तैयार, 
बार्डरोब से निकाल कर शर्ट,
चलने को तैयार,  
शर्ट का बटन टूटा देख,
माथे गुस्सा आने लगा, 
सुनती हो कह कर दी तेज आवाज, 
भागी भागी सी आई वो,
पूछा क्या है बात।

इशारे में समझायी मैंने अपनी बात,
झट ले आई बटन सुई धागा सब एक ही साथ,
बोली लाओ टांक दू बटन शर्ट के सीने में, 
फिर तो न रहेगी गुस्से की कोई बात।

मैंने भी हामी भर दी सुन उनकी बात,
फिर झट टांक दिया जो टूट गया था,
बटन शर्ट के सीने पर, 
शातं हुई उठी थी जहां से यह बात ।

धागा तोडने की कोशिश में
हुई मेरी शर्ट खराब, 
लगा रह गया एक सिन्दूरी दाग,
गुस्सा मेरा फिर भडका, 
पर हुआ न मैं नाराज, 
बाँहों मे ले बोला प्रिये छोडो यह सब, 
असाधारण घटना घटे न ऐसे ही,
इसमें भी है कोई बात खास, 
आखों में देख अश्रु दो,
हो गया था मैं भी उदास।

लिया गले लगाय तब पूछा,
रोने की क्या है इसमें कोई बात,
होता रहता है ऐसा इसमें नयी नहीं कोई बात, 
शर्ट उतार मैं बोला, 
चलो आज नहीं जाते हैं, 
लेकर छुट्टी आफिस से,
करते हैं प्यार भरी कुछ बात, 
बहुत दिन हुए,
नहीं हुई, 
वैसे भी हम दोनों में मन की बात, 
चलेंगे बाजार कुछ खा पी कर,
आज खरीदेंगे मिल हम सपनों की सौगात, 
आज खरीदेंगे मिल हम सपनों की सौगात।।

(हम रोजमर्रा के काम में जीवन की इन घटनाओं को महत्व नहीं देते हैं। महसूस अगर करें तो ऐसी छोटी मोटी घटनायें ही जीवन का असली नमक हैं।स्त्री मन की अपनी समस्याएँ होती हैं, अक्सर पुरुष वर्ग उनको नकारता रहता है। थोडा प्यार और सदभाव अगर बना रहे तो देखिए जीवन जीने का मजा और भी बढ जाता है। पसंद आये तो आशीर्वाद दीजिएगा, नहीं तो क्षमा।)

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