ऐसे ही रहा है चल, जीवन मेरा,
सुबह सुबह उठना,
पिसना ही पिसना,
भागना भागना ही है, मुझे रहना।
सत्तो का मुर्गा बांग दे जब,
समझो हुआ सवेरा,
मैं उठ जाऊं,
आखं खुलते ही चौके में, मैं जाऊं,
दूध गरम कर दो प्याले चाय बनाऊं,
एक मेरी और दूजी उनकी,
फिर जाकर मैं उन्हें प्यार से थपकी दे जगाऊं,
कभी साथ, कभी अकेले चाय मैं पी जाऊं।
भागमभाग शुरू हो जाए,
सिटी बस के आगे पीछे से,
जल्दी पहुचूं आफिस कैसे,
इंतजार, में बैठा बाॅस है रहता
आखं तरेर करता है वह स्वागत,
कहना पडता है मुझे भी,
झूठी मुस्कुराहट होठों पर लाकर,
गुडमार्निंगं सर, सुप्रभात सर ।
निपटाना पडता है, जल्दी जल्दी काम,
लेट अगर हो जाओ तो भुगतो परिणाम,
बीच बीच में होती रहती है,
थोडी बहुत सहकर्मियों से नोकझोंक,
थक हार बैठ जाती जब ,
चाय ला देते हैं, रामू काका,
कहते हैं, बेटा मुस्कुराओ,
और नये सिरे से,
काम करने में लग जाओ,
यहां सब ऐसे ही चलता है,
जीवन ऐसे ही कटता है।
थकी हारी आती हूँ,
बच्चों की देखती हूँ,
आखों में उनकी प्यार टपकता है,
इन्हीं के सहारे, जीवन मेरा कटता है।
पतिदेव आएगें लेट आज घर,
पार्टी रखी है दोस्त ने बार पर,
चांद झांकता है खिडकी उस पार,
निहारते उसे, स्वप्न बनने लगते हैं,
ख्वाबों में,
हम दूसरी दुनियां में चले जाते हैं।
दिल्ली को कहते सब, दिल्ली दिल वालों की है,
ताऊ जी के कहे शब्द याद हो आते हैं,
दिल्ली की लडकी मथुरा की गाय बाहर न व्याही जाय,
भाग फूटे हों त्यों ही वो बाहर जाय।
दिल्ली की हूं दिल्ली में ही रहती हूं,
चक्की के दो पाटों बीच पिसती रहती हूँ। — with Ram Saran Singh and 45 others.
सुबह सुबह उठना,
पिसना ही पिसना,
भागना भागना ही है, मुझे रहना।
सत्तो का मुर्गा बांग दे जब,
समझो हुआ सवेरा,
मैं उठ जाऊं,
आखं खुलते ही चौके में, मैं जाऊं,
दूध गरम कर दो प्याले चाय बनाऊं,
एक मेरी और दूजी उनकी,
फिर जाकर मैं उन्हें प्यार से थपकी दे जगाऊं,
कभी साथ, कभी अकेले चाय मैं पी जाऊं।
भागमभाग शुरू हो जाए,
सिटी बस के आगे पीछे से,
जल्दी पहुचूं आफिस कैसे,
इंतजार, में बैठा बाॅस है रहता
आखं तरेर करता है वह स्वागत,
कहना पडता है मुझे भी,
झूठी मुस्कुराहट होठों पर लाकर,
गुडमार्निंगं सर, सुप्रभात सर ।
निपटाना पडता है, जल्दी जल्दी काम,
लेट अगर हो जाओ तो भुगतो परिणाम,
बीच बीच में होती रहती है,
थोडी बहुत सहकर्मियों से नोकझोंक,
थक हार बैठ जाती जब ,
चाय ला देते हैं, रामू काका,
कहते हैं, बेटा मुस्कुराओ,
और नये सिरे से,
काम करने में लग जाओ,
यहां सब ऐसे ही चलता है,
जीवन ऐसे ही कटता है।
थकी हारी आती हूँ,
बच्चों की देखती हूँ,
आखों में उनकी प्यार टपकता है,
इन्हीं के सहारे, जीवन मेरा कटता है।
पतिदेव आएगें लेट आज घर,
पार्टी रखी है दोस्त ने बार पर,
चांद झांकता है खिडकी उस पार,
निहारते उसे, स्वप्न बनने लगते हैं,
ख्वाबों में,
हम दूसरी दुनियां में चले जाते हैं।
दिल्ली को कहते सब, दिल्ली दिल वालों की है,
ताऊ जी के कहे शब्द याद हो आते हैं,
दिल्ली की लडकी मथुरा की गाय बाहर न व्याही जाय,
भाग फूटे हों त्यों ही वो बाहर जाय।
दिल्ली की हूं दिल्ली में ही रहती हूं,
चक्की के दो पाटों बीच पिसती रहती हूँ। — with Ram Saran Singh and 45 others.


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