Friday, July 11, 2014

मरु की कहानी

कलम से _____

12th June, 2014

मरु की है यह अजब कहानी है
बैसाख जेठ में जाकर हमणे जानी है
चलो ले चलते साथ आपणे
देखें क्या मन आपणे ठानी है।

मरु की यह अजब कहानी है___

तपता है सूरज है जलता है रेत
लाल पीली चटकीले रंगो की ओढ चूनरी
पानी भरने जाऐ दूर गांव गूजरी
अमृत पानी की हर बूंद यहां है
बिन पानी सब सून यहां है
रेत यहां है तभी तो रेगिस्तान बना है
गरमी में सूरज सीधे अग्नि उगल रहा है
जीवन रंगो से भरा हुआ है
रंग है लोगां को बहुत प्यारे
सुर संगीत यहां के न्यारे
रात में छम छम पायल बजती है
गोरी उसपे खूब नचती है।

मरु की यह अजब कहानी है____

तपता है सूरज जलता है रेत
मरु में जेठ दुपहरी उडती रेत
कभी यहां कभी वहां बनाती जल खेत
झोंका एक हवा का बहा ले जाए
सुदंर दीखे हैं थाणे को
लाग रहे दूर से जो खेत
तपता है सूरज जलता है रेत।

बादल कहें चलो बरसेंगें आपणे देस
बदरी छोटीसी बोली मैं बरसूं हूं पहले
बूंद पानी की बरसी धरती पर
'छन्न' सी हुई जैसे गिरी हो गरम तवे पर
काले काले बदरा ना लाते हैं बरसात
बरसें गोरी के नैना उनकी होवे है बरसात
ऐसो है म्हारे राजस्थान
'पधारो म्हारे देस' हम है गाते
तपता है सूरज जलता है रेत।

मरु की यह अजब कहानी है___
 — with आशीष कैलाश तिवारी and 38 others. (5 photos)
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